dhruv mamoril trust

लोक सेवा का वास्तविक तात्पर्य जनहित तथा लोक कल्याण के उद्देश्य से उत्तरदायित्वपूर्णकार्यकलापों द्वारा निरूपित होता है। समाज की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत सामान्य विचारों को लेकर जनता की हित साधना के प्रयोजन से कल्याणकारी कार्य करना चाहे वे नियोजित हो अथवा नहीं लोकसेवा के नैतिक स्वरूप की अभिव्यक्ति करते है। लोकसेवा वस्तुत:परमार्थ की भावना से उद्वेलित होनी चाहिए।सेवा का अर्थ अपने से पृथक अन्य मानव की भलाई, उत्थान, विकास, उन्नति एवं सुख के लिए प्रयासरत रहने से होता है।

Sunday, 13 November 2011

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जय माँ विंध्यवासिनी

जय माँ विंध्यवासिनी

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Dhruvmemorial(suprabhat)
"मृत्यु - बोध " साँसों के रेशे जब खोल रहे होंगे मेरी देह से बंधी अंतिम गाँठ मेरा मन पकायेगा मेरी देह के चूल्हे पर सफ़र का अंतिम कलेवा और तुम भटकोगी प्रेम की गठरी सिर पर लिए दो देह लिप्त सभ्तायों के बिच, विवश उस निमिष अंतिम बार सुनूंगा मैं ... ... इन छप्परों पर से गुजरते परिंदों के झुण्ड का कलरव और याद आ जायेगा एक पिली शाम में उड़ता धानी आँचल विन्ध्य के बियाबानों में खोती एक आदिम कमंचे की धुन तेरे लिए चुराकर लाये मकई के हरे भुट्टे शायद ही मैं याद कर पाऊं जीवन भर के संग्राम मेरी असफलतायें रेत के निरर्थक टीलों पर मेरे अहम् का विजयघोष तुम देखना ... अविराम मेरी आँखों में ताकि सुन सको हमारे प्रणय का अंतिम गीत और मैं आत्मसात कर पाऊं विछोह की छाछ पर मक्खन बन उभर आई तेरी अम्लान छवि शायद वो अंतिम मंथन होगा हमारे सम्बन्धों का मेरी संततियों....! जब तुम रो पड़ोगे आदतन दांतों से नाख़ून कुतरते हुये मेरी चारपाई का उपरी पायदान पकड़ कर तब माफ़ कर देना अपने सर्जक को उसकी अक्षमता को शायद इस जीवन की निरंतरता का सत्य... ..........इसके अपूर्ण रह जाने में ही हैं जैसे वादन के बाद विराम उच्छ्वास के बाद निःश्वास तुम्हारी मान्यतायें मुझे मृत घोषित कर देगी देह की परिधियों पर और मैं भभक कर जी लूँगा अपनी मौत........................//
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