Tuesday, 21 August 2012

खामोशियों के मायने .


कई बार चुप बैठना 

और कुछ ना बोलना 
इर्द गिर्द आवाजों के घेरे में 
अपनी खामोशियों को बहाना 
अच्छा लगता है ...

और 
अच्छा लगता है 
जब तुम 'interpreter' की तरह 
मेरी खामोशियों का अनुवाद करते हो 
अपने अर्थ निकालते हो 
और बुद्धू सी मैं 
सोचती हूँ 
क्या यही अर्थ रहा होगा !!

फिर भी 
ज़िन्दगी 
तुम्हें ये मौका मैं देती रहूंगी ...

तुम बोलते रहना 
मैं सुनती रहूंगी ...
खामोशी से 
तुम्हारे दिए अर्थों में 
मायने बुनती रहूंगी .

खामोशी / The Silence

 शोर की एक नदी है ज़िन्दगी  ... मजबूरी है बहना, कभी धारा के साथ ...तो कभी धारा से उलटे। बहते बहते किसी टापू सी मिलती है ख़ामोशी ...घडी भर सुस्ता लेने को ...और फिर, वही ... शोर की नदी। 
               शब्द, जो हमने बनाये अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए, क्योंकि निहायत ज़रूरी था जुड़ना ...एक दूसरे से ...आखिर तो मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वही शब्द, जो रेशम की डोर जैसे हमें बांधते ....कब नुकीले पत्थर बन गए ...और हमने सीख लिया एक दूसरे को लहुलुहान करना, ये हम खुद भी नहीं जान सकते !
Tempest में Caliban कहता है -
“You taught me language, and my profit on't
  Is, I know how to curse”
 .

दौडती भागती इस ज़िन्दगी में इतने मसरूफ हैं हम शब्दों के शोर को सुलझाने में, कि भूल चले हैं खामोशी को ... जब शब्दों को ही नहीं समझ पाते हैं तो -          "मौन !!
                  समझे कौन ?
                    बांचे कौन ?"

चिरंतन के इस अंक में हमने एक छोटी सी कोशिश ज़रूर की है इस मौन को समझने-समझाने की ... उसे शब्दों में पिरोने की ... आइये आज बांचते हैं ... खामोशी !!

Thursday, 5 July 2012

बेहद उपयोगी नुस्खे....

आयुर्वेदिक दोहे आयुर्वेदिक दोहे

1.जहाँ कहीं भी आपको,काँटा कोइ लग जाय। दूधी पीस लगाइये, काँटा बाहर आय।।

2.मिश्री कत्था तनिक सा,चूसें मुँह में डाल। मुँह में छाले हों अगर,दूर होंय तत्काल।।a

3.पौदीना औ इलायची, लीजै दो-दो ग्राम। खायें उसे उबाल कर, उल्टी से आराम।।

4.छिलका लेंय इलायची,दो या तीन गिराम। सिर दर्द मुँह सूजना, लगा होय आराम।।

5.अण्डी पत्ता वृंत पर, चुना तनिक मिलाय। बार-बार तिल पर घिसे,तिल बाहर आ जाय।।

6.गाजर का रस पीजिये, आवश्कतानुसार। सभी जगह उपलब्ध यह,दूर करे अतिसार।।

7.खट्टा दामिड़ रस, दही,गाजर शाक पकाय। दूर करेगा अर्श को,जो भी इसको खाय।।

8.रस अनार की कली का,नाक बूँद दो डाल। खून बहे जो नाक से, बंद होय तत्काल।।

9.भून मुनक्का शुद्ध घी,सैंधा नमक मिलाय। चक्कर आना बंद हों,जो भी इसको खाय।।

10.मूली की शाखों का रस,ले निकाल सौ ग्राम। तीन बार दिन में पियें, पथरी से आराम।।

11.दो चम्मच रस प्याज की,मिश्री सँग पी जाय। पथरी केवल बीस दिन,में गल बाहर जाय।।

12.आधा कप अंगूर रस, केसर जरा मिलाय। पथरी से आराम हो, रोगी प्रतिदिन खाय।।

13.सदा करेला रस पिये,सुबहा हो औ शाम। दो चम्मच की मात्रा, पथरी से आराम।।

14.एक डेढ़ अनुपात कप, पालक रस चौलाइ। चीनी सँग लें बीस दिन,पथरी दे न दिखाइ।।

15.खीरे का रस लीजिये,कुछ दिन तीस ग्राम। लगातार सेवन करें, पथरी से आराम।।

16.बैगन भुर्ता बीज बिन,पन्द्रह दिन गर खाय। गल-गल करके आपकी,पथरी बाहर आय।।

17.लेकर कुलथी दाल को,पतली मगर बनाय। इसको नियमित खाय तो,पथरी बाहर आय।।

18.दामिड़(अनार) छिलका सुखाकर,पीसे चूर बनाय। सुबह-शाम जल डाल कम, पी मुँह बदबू जाय।।

19. चूना घी और शहद को, ले सम भाग मिलाय। बिच्छू को विष दूर हो, इसको यदि लगाय।।

20. गरम नीर को कीजिये, उसमें शहद मिलाय। तीन बार दिन लीजिये, तो जुकाम मिट जाय।।

21. अदरक रस मधु(शहद) भाग सम, करें अगर उपयोग। दूर आपसे होयगा, कफ औ खाँसी रोग।।

22. ताजे तुलसी-पत्र का, पीजे रस दस ग्राम। पेट दर्द से पायँगे, कुछ पल का आराम।।

23.बहुत सहज उपचार है, यदि आग जल जाय। मींगी पीस कपास की, फौरन जले लगाय।।

24.रुई जलाकर भस्म कर, वहाँ करें भुरकाव। जल्दी ही आराम हो, होय जहाँ पर घाव।।

25.नीम-पत्र के चूर्ण मैं, अजवायन इक ग्राम। गुण संग पीजै पेट के, कीड़ों से आराम।।

26.दो-दो चम्मच शहद औ, रस ले नीम का पात। रोग पीलिया दूर हो, उठे पिये जो प्रात।।

27.मिश्री के संग पीजिये, रस ये पत्ते नीम। पेंचिश के ये रोग में, काम न कोई हकीम।।

28.हरड बहेडा आँवला चौथी नीम गिलोय, पंचम जीरा डालकर सुमिरन काया होय॥

29.सावन में गुड खावै, सो मौहर बराबर पावै॥ —

नमक

 नमक
====
क्या चीज़ है ये नमक  भी
न हो तो हर स्वाद बेस्वाद
ज्यादा हो तो भी हर स्वाद बेस्वाद
नपा-तुला ही होना चाहिए इसे
क्यूंकि काट  जाता है जीभ को
चीर भी जाता है अंतड़ियों को
जब बदल जाता है अम्ल में
बढ़ा देता है रक्त-चाप भी
डाला जाता है कब्र में
गलाने को इस शरीर की माटी को
जमाने को बर्फ भी
होता है इसका इस्तेमाल
फिर  'नमक हलाल' और 'नमक हराम ' भी
दो शब्द ही तो हैं  नमक लिए हुए
ह्म्म....

फिर बताइए क्यूँ  मैं मुंह से निकले शब्दों को
नमक का नाम ना दूँ?

वीर-माता

(मुंशी प्रेमचंद की कहानी "धिक्कार" से प्रेरित हो लिखी गयी रचना...)

बित्ते भर का वह ईरान
हरा चुका था जिसे कई दफा यूनान
अब फिर आया सर उठाये
क्यूँ देशवासियों के हौसले लडखडाये
कैसे होगी लाज की रक्षा
कैसे हो मर्यादा का सम्मान

कुछ करना होगा अब तो
जो बचाए रखना है यूनान
चले सभी डेल्फी के मंदिर
पूछते कहाँ है चूक हुई
कहाँ रहे हम पीछे पूजा में
क्यूँ मचा है आज ये घमास...

Wednesday, 4 July 2012

सुनो !! अतीत कुछ कह रहा

हे मानव
तू मुझे छोड़
दौड़ता जा रहा है
बस अपनी ही धुन में

ये सच है की
मैं ही तुम्हें आगे बढ़ाता हूँ
पर तुम तो
मुझे धकेलकर
आगे दौड़ रहे हो

जानता हूँ
रुकना तेरी नियत नही
मुड़ कर देखना फितरत नही
पर तुम तो
स्नेह आदर संस्कृति संस्कार
का तिरस्कार कर चुके हो
इंसानियत का गला घोट चुके हो
बस अपने नाम के लिए
मुझे ही बदनाम कर रहे हो
स्वार्थ और धोखे की चढ़ सीढ़ी
खुद को ऊंचा समझ मुस्कराते हो

सिखलाने तुमको जीवन सत्य
सिखलाने तुमको जीवन मूल्य
परंपराओ का लिया सहारा था
आज सफल हुये जो जीवन मे
तब भी मुझ पर अंगुली उठाते हो
खुद कारण बने असफलता का
अब कारण मुझे बताकर कोसते हो

वैसे तुम पर एतबार कैसा ?
ममता का झूठा ढोंग करते हो
ममता की मूरत कन्या को
तुम जीवन से पहले मौत देते हो
जंन्म देकर पाला पोसा जिसने
तुम उन्ही को तिरस्कृत करते हो
हर सुख त्याग, प्यार और खुशी दी जिसने
अपने सुख की खातिर दुखी उनको करते हो
फिर भी निवेदन है तुमसे
कन्या को जीवन दे लक्ष्मी घर आने दो
माँ - पिता को हर पल खुद मे जिंदा रखो
इन रिश्तो की डोर को अतीत मत बनने दो

मैंने चलने से, कब तुमको रोका है
तुम्हारे आगे बढ्ने से तो, मैं वजूद मे रहता हूँ
अतीत बनकर, जिंदा रहूंगा सदा
बस एक विनती है, धीरे चलना
इस आज को भी, तो अतीत बनना है
जो मैंने सिखाया, तुम उसे भूलना नही
प्यार और सम्मान का हक, तुम सबको देना
परंपराओ को अपनी, अपवाद मत बनने देना
अपनी संस्कृति संस्कार का परिहास करना नही
जीवन मूल्यो को अपनाना, उनसे खेल खेलना नही
अच्छे बुरे का स्मरण कर लेना, सच को बस अपना लेना
अतीत हूँ, पर याद रखना आज भी तुम्हें कुछ सिखला जाऊंगा

Sunday, 24 June 2012

न तेरा इंतज़ार है न मै बेक़रार हूँ

·
सुबह होने की चिंता है न
अब गमे शाम की
हो गई मै भी बेगानी और विमुख तुमसे
तुम्हारे वादे तुम्हारे साथ थे
उस दौर में और उस गर्दिश में
सच्चाईयां ही सच्चाईयां जहाँ है लेकिन
कोई इलज़ाम मैंने दिया नही लेकिन
बस इलज़ाम में ही तुम हो
आ जाती है मिटे दर्द की याद
पर मुझे आराम भी बहुत है
दिल ही दिल में कोई रह- रह के
आ ही जाता है
आँख पड़ते ही उझल देते हो
पैमाना- ऐ- दिल
और नशा सा चढ़ता है
अब ये देखना है कि कब
तुम्हारे दिल में नक्श उभरता है
वफ़ा सुनते हैं पर शायद
वो दुनिया से ही मिट चली है
वो दिल मिटा दूँगी
जिस दिल में तुम्हारे ही चर्चे हैं
जो भूल कर भी उधर से गुजरूँ
रुकी हुई जिन्दगी जो
आजतक बेक़रार है
तरोताजा रहती हैं ये पलकें
अश्क है या फिर कोई शरार है
न हो तेरा सामना अब कभी
न तेरा इंतज़ार है
न मै बेक़रार हूँ

शायद तुम समझ गए

क्या तुम समझ गए मेरी बातों को
हाँ शायद तुम समझ गए
क्योंकि मै तो कायल हूँ
तुम्हारी समझदारी की ही
तुमसे परिचय होने से पहले से ही
प्रथमया ही मेरे लिए तुम विशेष थे
ये शायद तुम्हें भी समझ थी
तुमसे ही मैंने जीना सीखा
हर उदास आनन् पर तुम
खिलते रहे हर लम्हा तुम
तुमने ही दिया स्नेह से भरा
तुमने ही दिया प्रेम से भरा
दुर्लभ थी जो जिंदगी
दर्शनीय उसको किया
तुम मिले तो मेरी पहचान बनी
तुम मिले तो मेरी आवाज़ बनी
तुम मिले तो जन -जन की मै आज बनी
तुमसे ही मिली ऐसी ऊंचाई
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे
पर क्या ऊँचाई के साथ
विस्तार जरुरी नही है ?
तो ये विस्तार तुम्ही हों
तुम दूर रहोगे तब
इस भीड़ से मुझे
पृथक कैसे करोगे तब
भीड़ में मै खो जाऊँ
ये भी तुम्हें नही गवारा
फिर दूर चुपचाप खड़े तुम
मुझे खोते देखते रहोगे तुम
इस जीवन में
बिन मांगे जो तुमने दिया
फिर हटकर निष्ठुर जैसे तुम
हटते हों कि आते हों
मुझे बता दो
ये समझा दो
नित नूतन तुमसे ये बातें
निकट किया तुमसे मुझको
मेरी इच्छा इस संकट में
अपने योग्य
मुझे उबार लो
जब भी तुम ये अपना लोगे
अपने से परिचित करवा दोगे
कथा और व्यथा दोनों को लेकर
अपना मुझे बना लोगे
न रहे तुम जाने अनजाने
न रहे तुम पराये मनमाने
तुमसे ही तो रुष्ट हुई हूँ
तुमसे ही तो खुश हुई हूँ
चित्त व्यथित को
भले ही न दो सांत्वना
पर
संबल भले ही न जुटे
पर तुम ही तो
मेरे बल हों
मै पहचान हूँ तुम्हारी ही
तुम स्निग्ध प्रशांत हों
मेरे सुख में
मेरे दुःख में
तुम ही तुम हों मै ही तुम हूँ
(अरविन्द कु पाण्डेय )

Wednesday, 25 April 2012

कानो में पहुंचता उनका सुमधुर सन्देश,
दिल पर दस्तक देता कोई निर्निमेष ,
दिल को बहलाता .. मन को दौड़ाता ,
मुहब्बत का दिलाता एहसास ......

बढती जाती है प्यार की गहरी प्यास ,
जगाती उनसे मिलन की आस ,
मिली है जबसे उनसे नज़र ,
है अपनी न कोई खबर ,
हसरतें हो गयी जवाँ ,
है कितना गजब का ये समां ....
एक अलग- सा जज्बात ,
कितना प्यारा है ये एहसास ....!!

Friday, 16 March 2012

लेखनी की पूजा में ध्यानस्थ छवि सी!


एक भोली भाली भली सी... प्यारी सी लड़की... अपनी खिलखिलाहट से अँधेरा रौशन कर देने वाली लड़की... अपनी उदासी से हवाओं को भी उदासी का ही कोई नगमा डूब कर गाने को प्रेरित कर देने वाली लड़की... अपने विशुद्ध पागलपन में कुछ कुछ मेरे जैसी लेकिन अपनी विशिष्टताओं में केवल और केवल अपने जैसी, अकेली और अनूठी लड़की... कलम से हर बार चमत्कृत कर देने वाली रचनात्मकता का प्रतिबिम्ब- मेरे लिए यही तो है न परिचय लहरें वाली पूजा का!
बहुत दिनों से इस प्यारी सी लड़की के लिए बहुत कुछ लिखने का मन था... लेकिन जो हम करना चाहते हैं जो हम कहना चाहते हैं वह हमेशा हो ऐसा संभव तो नहीं... पता नहीं आज भी लिख जाएगा वह कुछ या नहीं या लिख भी गया तो प्रेषित हो पायेगा या नहीं...
एक दिन यूँ ही ढ़ेर सारी उदासी घेरे हुए थी... कोई ऐसा नहीं था जिससे बात की जाए... जिसके पास बस यूँ ही फ़ोन घुमा दिया जाए तभी कहीं से एक हवा के झोंके सी वह आई और परिचय का गहरा रंग लगाती हुई उड़ गयी...! तारीख़ भी कुछ ऐसी ही थी... कभी कभार आने वाली... २९ फ़रवरी! लेकिन उस दिन पहली बार बात करते हुए ही ये एहसास पक्का हो गया कि ये रंग अब हमेशा रहेगा मेरे जीवन में! लहरें आती जाती ये सुदूर तट अवश्य छूती रहेंगी और प्रतिविम्ब सा कुछ कुछ हर बार किनारों को लौटते हुए देती जायेंगी!
बहुत सारी यहाँ वहाँ की बातों के बीच उसकी खनकती हुई आवाज़ मेरी निधि बन गयी और एक प्यारी सी दोस्त से पुराना सा परिचय जान पड़ा भले बात पहली बार हुई हो...! कुछ एक परिचय ऐसे ही होते हैं, उनका होना ऐसा होता है जैसे नीरव अन्धकार में चमकता एक ध्रुवतारा! रिश्ते, भाव और एहसासों का आकाश ऐसा ही होता है... कल्पना सा सुन्दर पर यथार्थ की ठोस ज़मीन पर कड़ी
धूप में खिलखिलाता हुआ भी... तभी तो इनसे बड़ा सत्य कुछ और नहीं होता!
बात करते हुए ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार बात कर रहे हैं...
पूजा, देखना कहीं किसी दिन ढ़ेर सारी डार्क चोक्लेट्स के साथ तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक देने न पहुँच जायें... जितनी दूर हैं ऐसा संभव तो नहीं जान पड़ता लेकिन कौन जाने सच भी हो जाए... आखिर संभावनाओं का नाम ही तो जीवन है!
मिलते ही लगा, कि
अपनी है
जीवन इसकी आखों में
अर्थ नया पाता है!
'लेखनी की पूजा में ध्यानस्थ छवि'
देख इसे
शब्द स्वयं
संवर जाता है!!

Tuesday, 13 March 2012

वो चरित्रहीन है…

एक  बार मैंने किसी बुक में पढ़ा था, कि लड़की से बदला लेना बहुत आसान है. ज्यादा कुछ न करें और बस इतना कह दें कि ‘वो लड़की चरित्रहीन है’ बस इतना ही काफी है, बात फैलेगी और लड़की शर्म से खुद ही मर जाएगी. समय बीतने के साथ किताबों के कई पन्ने आंखों के आगे से निकल गए, लेकिन यह पंक्ति मुझे आज भी याद है. ऐसे कई मौके भी आए जब मुझे इस पंक्ति का अर्थ समझ में आया. भले ही हम कितना कह लें कि हमें फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अपने बारे में अनाप-शनाप सुनकर कोई लड़की परेशान न हो ऐसा हो ही नहीं सकता. सबके सामने खुद को सही साबित करना, परिवार की नजरों में अपने ‘गलत’ न होने की गवाही देना और ऐसे ही न जाने कितने सर्टिफिकेट हासिल करने की कोशिश….यह सब एक लड़की की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है. कभी अपनी इज्जत, कभी मां-बाप की इज्जत तो कभी ससुराल की इज्जत को बचाने की दुहाई, कई बार लगता है कि लड़कों के लिए ‘इज्जत’ जैसा शब्द बना ही नहीं है. कुछ दिन पहले की बात है मेरे एक परिचित का फोन आया. सामान्य बातचीत के बाद उन्होंने कहा कि तुम्हारी शादी की कहीं बात चल रही है क्या, लड़के के फलां-फलां रिश्तेदार हमारे परिचित हैं. उन्होंने तुम्हारे चाल-चलन के बारे में पूछा तो हमने कहा कि झट से ‘हां’ कर दीजिए’  मुझे बुरा तो लगा, लेकिन अब इस बुरेपन को झेलने की आदत हो गई है, जैसे हमें पसंद करके किसी ने हम पर बहुत बड़ा अहसान किया हो और अगर हमारे बारे में कुछ ऐसा-वैसा बक दिया गया होता तो हमारी इमेज पर थू-थू होने लगती. गुस्सा भी बहुत आया कि शादी-ब्याह के मामले में क्या कोई लड़की ‘प्रोडक्ट’ होती है कि जगह-जगह जाकर उसके चरित्र को सत्यापित कराते रहें. जो लोग अपने बेटों की बुराईयों पर पर्दा डालते रहते हैं, उन्हें भी बहू के रूप में एक सती-सावित्री लड़की चाहिए. लड़के की किसी बुरी आदत पर टिप्पणी करो तो घरवालों का एक ही रट्टा होता है ‘वो लड़का है’. लड़का है तो क्या ‘चरित्र’ नाम का लेबल उस पर चस्पा नहीं होता. कॉलेज के दिनों में मेरी एक फ्रेंड हुआ करती थी. वो आदर्श बेटी और बहू के सभी पैमानों पर खरी उतरती है. बावजूद इसके उसे इसलिए हमेशा रिजेक्ट किया जाता रहा कि वो गोरी नहीं है. कुछ दिन पहले उसका रिश्ता तय हुआ. उसने बताया कि लड़के की हाइट ज्यादा नहीं है न ही वो हैंडसम है. यही नहीं मेरी फ्रैंड के जितना पढ़ा-लिखा भी नहीं है, बावजूद इसके उसने लड़को को पसंद करने की कई वजहें गिनाई. उसे इस बात से भी परेशानी नहीं हुई कि लड़का बेरोजगार है. अगर मेरी फ्रैंड की जगह कोई लड़का होता तो लड़की के रंग, चरित्र, पढ़ाई-संस्कार संबंधी कोई न कोई मीन-मेख निकालकर रिजेक्ट करने के बहाने ढूंढ ही लेता, क्योंकि सर्वगुण संपन्न होने की शर्त केवल लड़कियों के लिए ही है.

Sunday, 11 March 2012

शायद यही एक जरिया है मेरे प्रतिकार का


फिल्म चलती है,
समेटती है जाने कितने ही दृश्यों को
एक डायलोग से शुरू हो ख़त्म हो जाती है
एक डायलोग पर,
मध्यांतर में भी उभरते हैं कितने ही दृश्य,
एक तानाशाह डालता है अपना जाल
और हर बार फंस जाते हैं तेल के कुछ कुँए,
वहीँ सर झुकाए खड़ा है कोई आखिरी गोली की तलाश में,
लिए हुए अपने नाम और कारनामों की तख्ती,
ये धमक, आवाज़ है गिरा दी गयीं 
चंद आस्थाओं की 
जो खड़ी थी सदियों से बामियान में
जैसे रेत की तरह गिर जाता है एक मुजस्मा,
जो नहीं जानता खुद की पहचान और देखता है 
खून भरी आँखों में अपने नए नए नाम,
एक शहंशाह बांटता है सहायता, क़र्ज़ और समर्थन के 
रंगीन गुब्बारे,     
बदले में भर लेता है अपनी जेबें स्वाभिमान, आज़ादी और 
कटी हुई जबानों से,
कहीं एक मजबूत पहाड़ की गौरवान्वित चोटी
बदल जाती है छोटे कमजोर पत्थरों में,
जिनसे खेल रहे हैं कुछ नामालूम लुटेरे 
और लिख रहे हैं जमीनों पर कभी न मिटने वाली इबारतें,
और बदल जाती हैं हजारों जिंदगियां जीरो ग्राऊंड  में,
कुछ लोग तब पोपकोर्न खाते है, कुछ ऊंघते हैं,
कुछ दबाते हैं अपनी चीखों को,
तब मेरी गूंगी ज़बान और कांपते हाथ
ढूँढ़ते है कागज़,
शायद यही एक जरिया है मेरे प्रतिकार का.....

गुनहगार

हाँ वह गुनहगार है
क्योंकि सूंघ सकती है उस मिटटी को
जिसमें बहुत गहराई से दफ़न है कई रातें
रातें जो दम तोड़ गयी रौशनी की एक चाह में
नाजायज़ है जो तुम्हारे मुताबिक,
कुफ्र है लांघना सली-गडी मान्यताओं की दहलीज़
क्योंकि धकेल दिया जाता है ऐसे दुस्साहसियों को
फतवों और निर्वासन के खौफनाक रास्तों पर,
वह गुनहगार है
क्योंकि नहीं गिरवी रख पाई अपनी आत्मा
जब बढ़ रहे थे फतवों के नरपिशाच उसकी ओर
जिनकी डोरी थी तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के हाथों में,
औरत जो होती है किसी की बेटी, बहन, प्रेयसी, पत्नी और माँ,
देखती हैं जब खुदको उनकी आँखों से ,
तो सारी शक्लें गडमड हो बदल जाती
हैं महज एक किताब में,
वह गुनहगार है
क्योंकि ठंडा नहीं होता उसका खून
उन तमाम सियाह रातों के बावजूद,
जब भटक रही थीं संवेदनाएं
शरण और ठोकरों की खुली पगडंडियों पर,
वो स्याही जम गयी है उसकी सुर्ख आखों में
जिसे सहेजती है वह जतन से
जानती है कि उसकी नापाक कलम से
निकले हर हर्फ़ को जरूरत है इसकी,
वह गुनहगार है
क्योंकि जानती है कि वे तमाम औरतें
जो ख़ामोशी से सौप देती हैं अपना जिस्म,
अपनी जबान और अपनी आत्मा तक
खतरा नहीं है किसी के लिए
दुकानों और कारखानों में पिसता वह मासूम
बचपन खतरा नहीं है किसी के लिए
हर वो गोली, बारूद और मशीनगन, जिसमें छिपी हैं
न जाने कितनी निर्दोष जानें
खतरा नहीं है किसी के लिए
वह गुनहगार है
क्योंकि तलाशती है
एक मजबूत दीवार जिसके साये में सुस्ता सके
उसके लगातार दौड़ते कदम और उसके रखवाले
जिनके लिए जरूरी है चाय की आखिरी घूँट तक
छोड़ दे ढोंग उसकी निगहबानी का,
वह जानती है कि
किसी दिन एक लिबलिबी दबेगी
और सुनाई देगी एक चीख, एक धमाका और खून की कुछ बूँदें  गिरेंगी
जिनसे किया जायेगा तिलक इतिहास की पेशानी पर
दुनिया देखेगी कि वो तब भी सफ़ेद नहीं होगा,
उस रात सो जायेंगे चैन की नींद,  इन्साफ के तमगे अपनी छाती
पर सजाये कुछ लोग
कि दुनिया अब सुरक्षित है
और सुरक्षित है  धर्मग्रंथों के तमाम नुस्खे

एक गीत सुनते हुए...!

जीवन के कई रंग होते हैं... कई पड़ाव होते हैं, कई मोड़ों से गुजरती है ज़िन्दगी... कभी तेज तो कभी मद्धम और एक ऐसा भी पल आता है जब अध्याय बदलता है. इस जीवन से उस जीवन का फासला पल में तय हो जाता है और मन अटका रह जाता है बीच में कहीं अपना क्षितिज तलाशता हुआ! इस पार से उस पार जाना हमेशा आसान नहीं होता..., कहीं से विदाई ही तो कहीं पर स्वागत का शंखनाद है- लेकिन भावों का संसार इन वाक्यांशों से नहीं बनता... यहाँ तो अश्रुधार है जो बह निकलती है शहनाई की धुन पर...! बचपन के आँगन को छोड़ते हुए यह दर्द सहती आई हैं बेटियां... अपने अंश को विदा करते हुए मात पिता अकथ पीड़ा महसूस करते आये हैं सदा से... और विदा करा कर ले जाने वालों की भी आँखें नम होती आयीं हैं सदा से ही... विदाई की घड़ी होती ही है ऐसी, गंभीरता की प्रतिमूर्ति बने भाई भी सुबकने लगते हैं और यह दृश्य इतना हृदयविदारक होता है कि इसकी कल्पना मात्र से मन विचलित सा होने लगता है.
कितना अजीब है ... पौधे भी अपनी ज़मीन और वातावरण से जुदा कर दिए जाएँ तो मर जाते हैं... गमले में खिलने वाला पौधा, वन में नहीं पनपता और वनफूल गमलों में नहीं खिलते लेकिन बेटियां एक आँगन को छोड़ दूसरे आँगन में कदम रखतीं हैं तो वहीँ की हो जाती हैं... ये सामर्थ्य केवल हमें दिया है प्रभु ने, रीत रिवाज़ जो निबाहने थे उसे सो उसने सारा धैर्य और अकूत सहनशक्ति हमें उपहारस्वरूप दे दी... तभी तो लीला चल रही है उसकी!
इन बातों को लेकर खूब उलझता है मन... सारे नियम भी खूब समझता है मन और ऐसे में नम आँखों से स्मृति का एक धागा पकड़ कर, छूट गए घर के आँगन में, बचपन के कितना ही लम्हे जी आता है. और फिर तो नयी उर्जा के साथ नए वातावरण से तादात्म्य स्थापित करने का क्रम चलता ही रहता है आजीवन...
ऐसे में अगर 'अब के बरस भेजो भैया को बाबुल' जो कहीं बज रहा हो तो सिर्फ कान ही नहीं रोम रोम सुनता है यह गीत और रुंधे हुए गले से स्वर नहीं निकलते तो आंसू कुछ शब्द के रूप में बह जाते हैं... इन शब्दों को सहेजते हुए हम उन कोटि कोटि नयनों की नमी महसूस कर रहे हैं जो इस दर्द से अनजान नहीं हैं...
पीछे छूट गए बचपन को याद करते हुए अपने आँगन के लिए ललकती... अपने नैहर से सन्देश की राह तकती पथरायी आखों का मर्म बेध डालता है. रिमझिम फुहारों के लिए तड़पती आत्मा का गीत है यह... कैसे भीगेगी आँखें! 'क्यूँ हुई मैं परायी' का जवाब किसी के पास नहीं यह जानते हुए भी जब स्वर मिलते हैं इस भाव को गीत में तो पूरी कलात्मकता से बिखरी हुई उदासी कुछ और उदास सी लगती है... है ?
ललित भैया, आपका भावुक हृदय अगर इस गीत पर कुछ लिखता तो वह निश्चित ही अनुपम होता... हम तो ऐसे में बस मौन ही साध सकते हैं...! आपकी प्रेरणा से कुछ बूंदें उकेरी हैं... दशमलव पर कभी इस गीत पर एक आलेख अपूर्ण से भावों को पूर्णता प्रदान करेगा