Friday, 16 March 2012

लेखनी की पूजा में ध्यानस्थ छवि सी!


एक भोली भाली भली सी... प्यारी सी लड़की... अपनी खिलखिलाहट से अँधेरा रौशन कर देने वाली लड़की... अपनी उदासी से हवाओं को भी उदासी का ही कोई नगमा डूब कर गाने को प्रेरित कर देने वाली लड़की... अपने विशुद्ध पागलपन में कुछ कुछ मेरे जैसी लेकिन अपनी विशिष्टताओं में केवल और केवल अपने जैसी, अकेली और अनूठी लड़की... कलम से हर बार चमत्कृत कर देने वाली रचनात्मकता का प्रतिबिम्ब- मेरे लिए यही तो है न परिचय लहरें वाली पूजा का!
बहुत दिनों से इस प्यारी सी लड़की के लिए बहुत कुछ लिखने का मन था... लेकिन जो हम करना चाहते हैं जो हम कहना चाहते हैं वह हमेशा हो ऐसा संभव तो नहीं... पता नहीं आज भी लिख जाएगा वह कुछ या नहीं या लिख भी गया तो प्रेषित हो पायेगा या नहीं...
एक दिन यूँ ही ढ़ेर सारी उदासी घेरे हुए थी... कोई ऐसा नहीं था जिससे बात की जाए... जिसके पास बस यूँ ही फ़ोन घुमा दिया जाए तभी कहीं से एक हवा के झोंके सी वह आई और परिचय का गहरा रंग लगाती हुई उड़ गयी...! तारीख़ भी कुछ ऐसी ही थी... कभी कभार आने वाली... २९ फ़रवरी! लेकिन उस दिन पहली बार बात करते हुए ही ये एहसास पक्का हो गया कि ये रंग अब हमेशा रहेगा मेरे जीवन में! लहरें आती जाती ये सुदूर तट अवश्य छूती रहेंगी और प्रतिविम्ब सा कुछ कुछ हर बार किनारों को लौटते हुए देती जायेंगी!
बहुत सारी यहाँ वहाँ की बातों के बीच उसकी खनकती हुई आवाज़ मेरी निधि बन गयी और एक प्यारी सी दोस्त से पुराना सा परिचय जान पड़ा भले बात पहली बार हुई हो...! कुछ एक परिचय ऐसे ही होते हैं, उनका होना ऐसा होता है जैसे नीरव अन्धकार में चमकता एक ध्रुवतारा! रिश्ते, भाव और एहसासों का आकाश ऐसा ही होता है... कल्पना सा सुन्दर पर यथार्थ की ठोस ज़मीन पर कड़ी
धूप में खिलखिलाता हुआ भी... तभी तो इनसे बड़ा सत्य कुछ और नहीं होता!
बात करते हुए ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार बात कर रहे हैं...
पूजा, देखना कहीं किसी दिन ढ़ेर सारी डार्क चोक्लेट्स के साथ तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक देने न पहुँच जायें... जितनी दूर हैं ऐसा संभव तो नहीं जान पड़ता लेकिन कौन जाने सच भी हो जाए... आखिर संभावनाओं का नाम ही तो जीवन है!
मिलते ही लगा, कि
अपनी है
जीवन इसकी आखों में
अर्थ नया पाता है!
'लेखनी की पूजा में ध्यानस्थ छवि'
देख इसे
शब्द स्वयं
संवर जाता है!!

Tuesday, 13 March 2012

वो चरित्रहीन है…

एक  बार मैंने किसी बुक में पढ़ा था, कि लड़की से बदला लेना बहुत आसान है. ज्यादा कुछ न करें और बस इतना कह दें कि ‘वो लड़की चरित्रहीन है’ बस इतना ही काफी है, बात फैलेगी और लड़की शर्म से खुद ही मर जाएगी. समय बीतने के साथ किताबों के कई पन्ने आंखों के आगे से निकल गए, लेकिन यह पंक्ति मुझे आज भी याद है. ऐसे कई मौके भी आए जब मुझे इस पंक्ति का अर्थ समझ में आया. भले ही हम कितना कह लें कि हमें फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अपने बारे में अनाप-शनाप सुनकर कोई लड़की परेशान न हो ऐसा हो ही नहीं सकता. सबके सामने खुद को सही साबित करना, परिवार की नजरों में अपने ‘गलत’ न होने की गवाही देना और ऐसे ही न जाने कितने सर्टिफिकेट हासिल करने की कोशिश….यह सब एक लड़की की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है. कभी अपनी इज्जत, कभी मां-बाप की इज्जत तो कभी ससुराल की इज्जत को बचाने की दुहाई, कई बार लगता है कि लड़कों के लिए ‘इज्जत’ जैसा शब्द बना ही नहीं है. कुछ दिन पहले की बात है मेरे एक परिचित का फोन आया. सामान्य बातचीत के बाद उन्होंने कहा कि तुम्हारी शादी की कहीं बात चल रही है क्या, लड़के के फलां-फलां रिश्तेदार हमारे परिचित हैं. उन्होंने तुम्हारे चाल-चलन के बारे में पूछा तो हमने कहा कि झट से ‘हां’ कर दीजिए’  मुझे बुरा तो लगा, लेकिन अब इस बुरेपन को झेलने की आदत हो गई है, जैसे हमें पसंद करके किसी ने हम पर बहुत बड़ा अहसान किया हो और अगर हमारे बारे में कुछ ऐसा-वैसा बक दिया गया होता तो हमारी इमेज पर थू-थू होने लगती. गुस्सा भी बहुत आया कि शादी-ब्याह के मामले में क्या कोई लड़की ‘प्रोडक्ट’ होती है कि जगह-जगह जाकर उसके चरित्र को सत्यापित कराते रहें. जो लोग अपने बेटों की बुराईयों पर पर्दा डालते रहते हैं, उन्हें भी बहू के रूप में एक सती-सावित्री लड़की चाहिए. लड़के की किसी बुरी आदत पर टिप्पणी करो तो घरवालों का एक ही रट्टा होता है ‘वो लड़का है’. लड़का है तो क्या ‘चरित्र’ नाम का लेबल उस पर चस्पा नहीं होता. कॉलेज के दिनों में मेरी एक फ्रेंड हुआ करती थी. वो आदर्श बेटी और बहू के सभी पैमानों पर खरी उतरती है. बावजूद इसके उसे इसलिए हमेशा रिजेक्ट किया जाता रहा कि वो गोरी नहीं है. कुछ दिन पहले उसका रिश्ता तय हुआ. उसने बताया कि लड़के की हाइट ज्यादा नहीं है न ही वो हैंडसम है. यही नहीं मेरी फ्रैंड के जितना पढ़ा-लिखा भी नहीं है, बावजूद इसके उसने लड़को को पसंद करने की कई वजहें गिनाई. उसे इस बात से भी परेशानी नहीं हुई कि लड़का बेरोजगार है. अगर मेरी फ्रैंड की जगह कोई लड़का होता तो लड़की के रंग, चरित्र, पढ़ाई-संस्कार संबंधी कोई न कोई मीन-मेख निकालकर रिजेक्ट करने के बहाने ढूंढ ही लेता, क्योंकि सर्वगुण संपन्न होने की शर्त केवल लड़कियों के लिए ही है.

Sunday, 11 March 2012

शायद यही एक जरिया है मेरे प्रतिकार का


फिल्म चलती है,
समेटती है जाने कितने ही दृश्यों को
एक डायलोग से शुरू हो ख़त्म हो जाती है
एक डायलोग पर,
मध्यांतर में भी उभरते हैं कितने ही दृश्य,
एक तानाशाह डालता है अपना जाल
और हर बार फंस जाते हैं तेल के कुछ कुँए,
वहीँ सर झुकाए खड़ा है कोई आखिरी गोली की तलाश में,
लिए हुए अपने नाम और कारनामों की तख्ती,
ये धमक, आवाज़ है गिरा दी गयीं 
चंद आस्थाओं की 
जो खड़ी थी सदियों से बामियान में
जैसे रेत की तरह गिर जाता है एक मुजस्मा,
जो नहीं जानता खुद की पहचान और देखता है 
खून भरी आँखों में अपने नए नए नाम,
एक शहंशाह बांटता है सहायता, क़र्ज़ और समर्थन के 
रंगीन गुब्बारे,     
बदले में भर लेता है अपनी जेबें स्वाभिमान, आज़ादी और 
कटी हुई जबानों से,
कहीं एक मजबूत पहाड़ की गौरवान्वित चोटी
बदल जाती है छोटे कमजोर पत्थरों में,
जिनसे खेल रहे हैं कुछ नामालूम लुटेरे 
और लिख रहे हैं जमीनों पर कभी न मिटने वाली इबारतें,
और बदल जाती हैं हजारों जिंदगियां जीरो ग्राऊंड  में,
कुछ लोग तब पोपकोर्न खाते है, कुछ ऊंघते हैं,
कुछ दबाते हैं अपनी चीखों को,
तब मेरी गूंगी ज़बान और कांपते हाथ
ढूँढ़ते है कागज़,
शायद यही एक जरिया है मेरे प्रतिकार का.....

गुनहगार

हाँ वह गुनहगार है
क्योंकि सूंघ सकती है उस मिटटी को
जिसमें बहुत गहराई से दफ़न है कई रातें
रातें जो दम तोड़ गयी रौशनी की एक चाह में
नाजायज़ है जो तुम्हारे मुताबिक,
कुफ्र है लांघना सली-गडी मान्यताओं की दहलीज़
क्योंकि धकेल दिया जाता है ऐसे दुस्साहसियों को
फतवों और निर्वासन के खौफनाक रास्तों पर,
वह गुनहगार है
क्योंकि नहीं गिरवी रख पाई अपनी आत्मा
जब बढ़ रहे थे फतवों के नरपिशाच उसकी ओर
जिनकी डोरी थी तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के हाथों में,
औरत जो होती है किसी की बेटी, बहन, प्रेयसी, पत्नी और माँ,
देखती हैं जब खुदको उनकी आँखों से ,
तो सारी शक्लें गडमड हो बदल जाती
हैं महज एक किताब में,
वह गुनहगार है
क्योंकि ठंडा नहीं होता उसका खून
उन तमाम सियाह रातों के बावजूद,
जब भटक रही थीं संवेदनाएं
शरण और ठोकरों की खुली पगडंडियों पर,
वो स्याही जम गयी है उसकी सुर्ख आखों में
जिसे सहेजती है वह जतन से
जानती है कि उसकी नापाक कलम से
निकले हर हर्फ़ को जरूरत है इसकी,
वह गुनहगार है
क्योंकि जानती है कि वे तमाम औरतें
जो ख़ामोशी से सौप देती हैं अपना जिस्म,
अपनी जबान और अपनी आत्मा तक
खतरा नहीं है किसी के लिए
दुकानों और कारखानों में पिसता वह मासूम
बचपन खतरा नहीं है किसी के लिए
हर वो गोली, बारूद और मशीनगन, जिसमें छिपी हैं
न जाने कितनी निर्दोष जानें
खतरा नहीं है किसी के लिए
वह गुनहगार है
क्योंकि तलाशती है
एक मजबूत दीवार जिसके साये में सुस्ता सके
उसके लगातार दौड़ते कदम और उसके रखवाले
जिनके लिए जरूरी है चाय की आखिरी घूँट तक
छोड़ दे ढोंग उसकी निगहबानी का,
वह जानती है कि
किसी दिन एक लिबलिबी दबेगी
और सुनाई देगी एक चीख, एक धमाका और खून की कुछ बूँदें  गिरेंगी
जिनसे किया जायेगा तिलक इतिहास की पेशानी पर
दुनिया देखेगी कि वो तब भी सफ़ेद नहीं होगा,
उस रात सो जायेंगे चैन की नींद,  इन्साफ के तमगे अपनी छाती
पर सजाये कुछ लोग
कि दुनिया अब सुरक्षित है
और सुरक्षित है  धर्मग्रंथों के तमाम नुस्खे

एक गीत सुनते हुए...!

जीवन के कई रंग होते हैं... कई पड़ाव होते हैं, कई मोड़ों से गुजरती है ज़िन्दगी... कभी तेज तो कभी मद्धम और एक ऐसा भी पल आता है जब अध्याय बदलता है. इस जीवन से उस जीवन का फासला पल में तय हो जाता है और मन अटका रह जाता है बीच में कहीं अपना क्षितिज तलाशता हुआ! इस पार से उस पार जाना हमेशा आसान नहीं होता..., कहीं से विदाई ही तो कहीं पर स्वागत का शंखनाद है- लेकिन भावों का संसार इन वाक्यांशों से नहीं बनता... यहाँ तो अश्रुधार है जो बह निकलती है शहनाई की धुन पर...! बचपन के आँगन को छोड़ते हुए यह दर्द सहती आई हैं बेटियां... अपने अंश को विदा करते हुए मात पिता अकथ पीड़ा महसूस करते आये हैं सदा से... और विदा करा कर ले जाने वालों की भी आँखें नम होती आयीं हैं सदा से ही... विदाई की घड़ी होती ही है ऐसी, गंभीरता की प्रतिमूर्ति बने भाई भी सुबकने लगते हैं और यह दृश्य इतना हृदयविदारक होता है कि इसकी कल्पना मात्र से मन विचलित सा होने लगता है.
कितना अजीब है ... पौधे भी अपनी ज़मीन और वातावरण से जुदा कर दिए जाएँ तो मर जाते हैं... गमले में खिलने वाला पौधा, वन में नहीं पनपता और वनफूल गमलों में नहीं खिलते लेकिन बेटियां एक आँगन को छोड़ दूसरे आँगन में कदम रखतीं हैं तो वहीँ की हो जाती हैं... ये सामर्थ्य केवल हमें दिया है प्रभु ने, रीत रिवाज़ जो निबाहने थे उसे सो उसने सारा धैर्य और अकूत सहनशक्ति हमें उपहारस्वरूप दे दी... तभी तो लीला चल रही है उसकी!
इन बातों को लेकर खूब उलझता है मन... सारे नियम भी खूब समझता है मन और ऐसे में नम आँखों से स्मृति का एक धागा पकड़ कर, छूट गए घर के आँगन में, बचपन के कितना ही लम्हे जी आता है. और फिर तो नयी उर्जा के साथ नए वातावरण से तादात्म्य स्थापित करने का क्रम चलता ही रहता है आजीवन...
ऐसे में अगर 'अब के बरस भेजो भैया को बाबुल' जो कहीं बज रहा हो तो सिर्फ कान ही नहीं रोम रोम सुनता है यह गीत और रुंधे हुए गले से स्वर नहीं निकलते तो आंसू कुछ शब्द के रूप में बह जाते हैं... इन शब्दों को सहेजते हुए हम उन कोटि कोटि नयनों की नमी महसूस कर रहे हैं जो इस दर्द से अनजान नहीं हैं...
पीछे छूट गए बचपन को याद करते हुए अपने आँगन के लिए ललकती... अपने नैहर से सन्देश की राह तकती पथरायी आखों का मर्म बेध डालता है. रिमझिम फुहारों के लिए तड़पती आत्मा का गीत है यह... कैसे भीगेगी आँखें! 'क्यूँ हुई मैं परायी' का जवाब किसी के पास नहीं यह जानते हुए भी जब स्वर मिलते हैं इस भाव को गीत में तो पूरी कलात्मकता से बिखरी हुई उदासी कुछ और उदास सी लगती है... है ?
ललित भैया, आपका भावुक हृदय अगर इस गीत पर कुछ लिखता तो वह निश्चित ही अनुपम होता... हम तो ऐसे में बस मौन ही साध सकते हैं...! आपकी प्रेरणा से कुछ बूंदें उकेरी हैं... दशमलव पर कभी इस गीत पर एक आलेख अपूर्ण से भावों को पूर्णता प्रदान करेगा