जीवन के कई रंग होते
हैं... कई पड़ाव होते
हैं, कई मोड़ों से गुजरती
है ज़िन्दगी... कभी तेज
तो कभी मद्धम और एक
ऐसा भी पल आता है
जब अध्याय बदलता है.
इस जीवन से उस जीवन
का फासला पल में तय
हो जाता है और मन
अटका रह जाता है बीच
में कहीं अपना क्षितिज
तलाशता हुआ! इस पार से
उस पार जाना हमेशा आसान
नहीं होता..., कहीं से
विदाई ही तो कहीं पर
स्वागत का शंखनाद है-
लेकिन भावों का संसार
इन वाक्यांशों से नहीं
बनता... यहाँ तो अश्रुधार
है जो बह निकलती है
शहनाई की धुन पर...!
बचपन के आँगन को छोड़ते
हुए यह दर्द सहती आई
हैं बेटियां... अपने अंश
को विदा करते हुए मात
पिता अकथ पीड़ा महसूस
करते आये हैं सदा से...
और विदा करा कर ले
जाने वालों की भी आँखें
नम होती आयीं हैं सदा
से ही... विदाई की घड़ी
होती ही है ऐसी, गंभीरता
की प्रतिमूर्ति बने भाई
भी सुबकने लगते हैं और
यह दृश्य इतना हृदयविदारक
होता है कि इसकी कल्पना
मात्र से मन विचलित सा
होने लगता है.
कितना अजीब है न... पौधे भी अपनी ज़मीन और वातावरण से जुदा कर दिए जाएँ तो मर जाते हैं... गमले में खिलने वाला पौधा, वन में नहीं पनपता और वनफूल गमलों में नहीं खिलते लेकिन बेटियां एक आँगन को छोड़ दूसरे आँगन में कदम रखतीं हैं तो वहीँ की हो जाती हैं... ये सामर्थ्य केवल हमें दिया है प्रभु ने, रीत रिवाज़ जो निबाहने थे उसे सो उसने सारा धैर्य और अकूत सहनशक्ति हमें उपहारस्वरूप दे दी... तभी तो लीला चल रही है उसकी!
इन बातों को लेकर खूब उलझता है मन... सारे नियम भी खूब समझता है मन और ऐसे में नम आँखों से स्मृति का एक धागा पकड़ कर, छूट गए घर के आँगन में, बचपन के कितना ही लम्हे जी आता है. और फिर तो नयी उर्जा के साथ नए वातावरण से तादात्म्य स्थापित करने का क्रम चलता ही रहता है आजीवन...
ऐसे में अगर 'अब के बरस भेजो भैया को बाबुल' जो कहीं बज रहा हो तो सिर्फ कान ही नहीं रोम रोम सुनता है यह गीत और रुंधे हुए गले से स्वर नहीं निकलते तो आंसू कुछ शब्द के रूप में बह जाते हैं... इन शब्दों को सहेजते हुए हम उन कोटि कोटि नयनों की नमी महसूस कर रहे हैं जो इस दर्द से अनजान नहीं हैं...
पीछे छूट गए बचपन को याद करते हुए अपने आँगन के लिए ललकती... अपने नैहर से सन्देश की राह तकती पथरायी आखों का मर्म बेध डालता है. रिमझिम फुहारों के लिए तड़पती आत्मा का गीत है यह... कैसे न भीगेगी आँखें! 'क्यूँ हुई मैं परायी' का जवाब किसी के पास नहीं यह जानते हुए भी जब स्वर मिलते हैं इस भाव को गीत में तो पूरी कलात्मकता से बिखरी हुई उदासी कुछ और उदास सी लगती है... है न?
ललित भैया, आपका भावुक हृदय अगर इस गीत पर कुछ लिखता तो वह निश्चित ही अनुपम होता... हम तो ऐसे में बस मौन ही साध सकते हैं...! आपकी प्रेरणा से कुछ बूंदें उकेरी हैं... दशमलव पर कभी इस गीत पर एक आलेख अपूर्ण से भावों को पूर्णता प्रदान करेगा
कितना अजीब है न... पौधे भी अपनी ज़मीन और वातावरण से जुदा कर दिए जाएँ तो मर जाते हैं... गमले में खिलने वाला पौधा, वन में नहीं पनपता और वनफूल गमलों में नहीं खिलते लेकिन बेटियां एक आँगन को छोड़ दूसरे आँगन में कदम रखतीं हैं तो वहीँ की हो जाती हैं... ये सामर्थ्य केवल हमें दिया है प्रभु ने, रीत रिवाज़ जो निबाहने थे उसे सो उसने सारा धैर्य और अकूत सहनशक्ति हमें उपहारस्वरूप दे दी... तभी तो लीला चल रही है उसकी!
इन बातों को लेकर खूब उलझता है मन... सारे नियम भी खूब समझता है मन और ऐसे में नम आँखों से स्मृति का एक धागा पकड़ कर, छूट गए घर के आँगन में, बचपन के कितना ही लम्हे जी आता है. और फिर तो नयी उर्जा के साथ नए वातावरण से तादात्म्य स्थापित करने का क्रम चलता ही रहता है आजीवन...
ऐसे में अगर 'अब के बरस भेजो भैया को बाबुल' जो कहीं बज रहा हो तो सिर्फ कान ही नहीं रोम रोम सुनता है यह गीत और रुंधे हुए गले से स्वर नहीं निकलते तो आंसू कुछ शब्द के रूप में बह जाते हैं... इन शब्दों को सहेजते हुए हम उन कोटि कोटि नयनों की नमी महसूस कर रहे हैं जो इस दर्द से अनजान नहीं हैं...
पीछे छूट गए बचपन को याद करते हुए अपने आँगन के लिए ललकती... अपने नैहर से सन्देश की राह तकती पथरायी आखों का मर्म बेध डालता है. रिमझिम फुहारों के लिए तड़पती आत्मा का गीत है यह... कैसे न भीगेगी आँखें! 'क्यूँ हुई मैं परायी' का जवाब किसी के पास नहीं यह जानते हुए भी जब स्वर मिलते हैं इस भाव को गीत में तो पूरी कलात्मकता से बिखरी हुई उदासी कुछ और उदास सी लगती है... है न?
ललित भैया, आपका भावुक हृदय अगर इस गीत पर कुछ लिखता तो वह निश्चित ही अनुपम होता... हम तो ऐसे में बस मौन ही साध सकते हैं...! आपकी प्रेरणा से कुछ बूंदें उकेरी हैं... दशमलव पर कभी इस गीत पर एक आलेख अपूर्ण से भावों को पूर्णता प्रदान करेगा

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