हाँ वह गुनहगार है
क्योंकि सूंघ सकती है उस मिटटी को
क्योंकि सूंघ सकती है उस मिटटी को
जिसमें बहुत गहराई से
दफ़न है कई रातें
रातें जो दम तोड़ गयी रौशनी की एक चाह में
रातें जो दम तोड़ गयी रौशनी की एक चाह में
नाजायज़ है जो
तुम्हारे मुताबिक,
कुफ्र है लांघना सली-गडी मान्यताओं की दहलीज़
क्योंकि धकेल दिया
जाता है ऐसे दुस्साहसियों को
फतवों और निर्वासन के
खौफनाक रास्तों पर,
वह गुनहगार है
क्योंकि नहीं गिरवी रख
पाई अपनी आत्मा
जब बढ़ रहे थे फतवों
के नरपिशाच उसकी ओर
जिनकी डोरी थी तथाकथित
धर्म के ठेकेदारों के हाथों
में,
औरत जो होती है किसी
की बेटी, बहन, प्रेयसी, पत्नी
और माँ,
देखती हैं जब खुदको
उनकी आँखों से ,
तो सारी शक्लें गडमड
हो बदल जाती
हैं महज एक किताब में,
वह गुनहगार है
क्योंकि ठंडा नहीं
होता उसका खून
उन तमाम सियाह रातों
के बावजूद,
जब भटक रही थीं
संवेदनाएं
शरण और ठोकरों की खुली
पगडंडियों पर,
वो स्याही जम गयी है
उसकी सुर्ख आखों में
जिसे सहेजती है वह जतन
से
जानती है कि उसकी
नापाक कलम से
निकले हर हर्फ़ को
जरूरत है इसकी,
वह गुनहगार है
क्योंकि जानती है कि
वे तमाम औरतें
जो ख़ामोशी से सौप
देती हैं अपना जिस्म,
अपनी जबान और अपनी
आत्मा तक
खतरा नहीं है किसी के
लिए
दुकानों और कारखानों
में पिसता वह मासूम
बचपन खतरा नहीं है
किसी के लिए
हर वो गोली, बारूद और मशीनगन, जिसमें
छिपी हैं
न जाने कितनी निर्दोष
जानें
खतरा नहीं है किसी के
लिए
वह गुनहगार है
क्योंकि तलाशती है
एक मजबूत दीवार जिसके
साये में सुस्ता सके
उसके लगातार दौड़ते कदम और उसके रखवाले
जिनके लिए जरूरी है
चाय की आखिरी घूँट तक
छोड़ दे ढोंग उसकी
निगहबानी का,
वह जानती है कि
किसी दिन एक लिबलिबी
दबेगी
और सुनाई देगी एक चीख, एक
धमाका और खून की कुछ बूँदें गिरेंगी
जिनसे किया जायेगा
तिलक इतिहास की पेशानी पर
दुनिया देखेगी कि वो
तब भी सफ़ेद नहीं होगा,
उस रात सो जायेंगे चैन
की नींद, इन्साफ
के तमगे अपनी छाती
पर सजाये कुछ लोग
कि दुनिया अब सुरक्षित
है
और सुरक्षित है
धर्मग्रंथों के तमाम नुस्खे
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