Sunday, 24 June 2012

शायद तुम समझ गए

क्या तुम समझ गए मेरी बातों को
हाँ शायद तुम समझ गए
क्योंकि मै तो कायल हूँ
तुम्हारी समझदारी की ही
तुमसे परिचय होने से पहले से ही
प्रथमया ही मेरे लिए तुम विशेष थे
ये शायद तुम्हें भी समझ थी
तुमसे ही मैंने जीना सीखा
हर उदास आनन् पर तुम
खिलते रहे हर लम्हा तुम
तुमने ही दिया स्नेह से भरा
तुमने ही दिया प्रेम से भरा
दुर्लभ थी जो जिंदगी
दर्शनीय उसको किया
तुम मिले तो मेरी पहचान बनी
तुम मिले तो मेरी आवाज़ बनी
तुम मिले तो जन -जन की मै आज बनी
तुमसे ही मिली ऐसी ऊंचाई
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे
पर क्या ऊँचाई के साथ
विस्तार जरुरी नही है ?
तो ये विस्तार तुम्ही हों
तुम दूर रहोगे तब
इस भीड़ से मुझे
पृथक कैसे करोगे तब
भीड़ में मै खो जाऊँ
ये भी तुम्हें नही गवारा
फिर दूर चुपचाप खड़े तुम
मुझे खोते देखते रहोगे तुम
इस जीवन में
बिन मांगे जो तुमने दिया
फिर हटकर निष्ठुर जैसे तुम
हटते हों कि आते हों
मुझे बता दो
ये समझा दो
नित नूतन तुमसे ये बातें
निकट किया तुमसे मुझको
मेरी इच्छा इस संकट में
अपने योग्य
मुझे उबार लो
जब भी तुम ये अपना लोगे
अपने से परिचित करवा दोगे
कथा और व्यथा दोनों को लेकर
अपना मुझे बना लोगे
न रहे तुम जाने अनजाने
न रहे तुम पराये मनमाने
तुमसे ही तो रुष्ट हुई हूँ
तुमसे ही तो खुश हुई हूँ
चित्त व्यथित को
भले ही न दो सांत्वना
पर
संबल भले ही न जुटे
पर तुम ही तो
मेरे बल हों
मै पहचान हूँ तुम्हारी ही
तुम स्निग्ध प्रशांत हों
मेरे सुख में
मेरे दुःख में
तुम ही तुम हों मै ही तुम हूँ
(अरविन्द कु पाण्डेय )

No comments:

Post a Comment