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अब गमे शाम की
हो गई मै भी बेगानी और विमुख तुमसे
तुम्हारे वादे तुम्हारे साथ थे
उस दौर में और उस गर्दिश में
सच्चाईयां ही सच्चाईयां जहाँ है लेकिन
कोई इलज़ाम मैंने दिया नही लेकिन
बस इलज़ाम में ही तुम हो
आ जाती है मिटे दर्द की याद
पर मुझे आराम भी बहुत है
दिल ही दिल में कोई रह- रह के
आ ही जाता है
आँख पड़ते ही उझल देते हो
पैमाना- ऐ- दिल
और नशा सा चढ़ता है
अब ये देखना है कि कब
तुम्हारे दिल में नक्श उभरता है
वफ़ा सुनते हैं पर शायद
वो दुनिया से ही मिट चली है
वो दिल मिटा दूँगी
जिस दिल में तुम्हारे ही चर्चे हैं
जो भूल कर भी उधर से गुजरूँ
रुकी हुई जिन्दगी जो
आजतक बेक़रार है
तरोताजा रहती हैं ये पलकें
अश्क है या फिर कोई शरार है
न हो तेरा सामना अब कभी
न तेरा इंतज़ार है
न मै बेक़रार हूँ


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