Tuesday, 21 August 2012

खामोशी / The Silence

 शोर की एक नदी है ज़िन्दगी  ... मजबूरी है बहना, कभी धारा के साथ ...तो कभी धारा से उलटे। बहते बहते किसी टापू सी मिलती है ख़ामोशी ...घडी भर सुस्ता लेने को ...और फिर, वही ... शोर की नदी। 
               शब्द, जो हमने बनाये अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए, क्योंकि निहायत ज़रूरी था जुड़ना ...एक दूसरे से ...आखिर तो मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वही शब्द, जो रेशम की डोर जैसे हमें बांधते ....कब नुकीले पत्थर बन गए ...और हमने सीख लिया एक दूसरे को लहुलुहान करना, ये हम खुद भी नहीं जान सकते !
Tempest में Caliban कहता है -
“You taught me language, and my profit on't
  Is, I know how to curse”
 .

दौडती भागती इस ज़िन्दगी में इतने मसरूफ हैं हम शब्दों के शोर को सुलझाने में, कि भूल चले हैं खामोशी को ... जब शब्दों को ही नहीं समझ पाते हैं तो -          "मौन !!
                  समझे कौन ?
                    बांचे कौन ?"

चिरंतन के इस अंक में हमने एक छोटी सी कोशिश ज़रूर की है इस मौन को समझने-समझाने की ... उसे शब्दों में पिरोने की ... आइये आज बांचते हैं ... खामोशी !!

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