Saturday, 24 May 2014

पत्र


मेरे विचार से संसार मे ऐसा कोई व्यक्ति नहीं, जिसको अपने अस्तित्व पर विश्वास न हो। हाँ अपनी शक्ति पर भले विश्वास हो या न हो।और जिसे अपने अस्तित्व पर संदेह नहीं वह कभी नास्तिक नहीं हो सकता; क्योंकि अपने आप पर के विश्वास का आधार ही ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण है।आपका जिस पर विश्वास है, जिस पर आस्था एवं श्रृद्धा है; वही तो परमात्मा है, ईश्वर है। अब उनकी शिकायत भी सुनें और यदि उसे दूर करने की सामर्थ्य हो, तो उसे दूर भी करें।

ईश्वर की तरफ से शिकायत:

मेरे प्रिय...
सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे, मैं तुम्हारे बिस्तर के
पास ही खड़ा था।
मुझे लगा कि तुम मुझसे कुछ बात
करोगे।
तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात
या घटना के लिये मुझे धन्यवाद कहोगे।
लेकिन तुम
फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और
मेरी तरफ देखा भी नहीं!!!
फिर मैंने सोचा कि तुम
स्नान करके मुझे याद करोगे।
पर तुम इस उधेड़बुन में लग
गये कि तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने है!!!
फिर जब
तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपने ऑफिस के
कागज़ इक्कटठे करने के लिये घर में इधर से उधर
दौड़ रहे थे...तो भी मुझे लगा कि शायद अब तुम्हे
मेरा ध्यान आयेगा,लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
फिर जब तुमने आफिस जाने के लिए साधन
पकड़ा तो मैं समझा कि इस खाली समय का उपयोग
तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे पर तुमने थोड़ी देर
पेपर पढ़ा और फिर खेलने लग गए अपने मोबाइल में
और मैं खड़ा का खड़ा ही रह गया।
मैं तुम्हें बताना चाहता था कि दिन का कुछ
हिस्सा मेरे साथ बिता कर तो देखो,तुम्हारे काम और
भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन तुमनें मुझसे बात
ही नहीं की...
एक मौका ऐसा भी आया जब तुम
बिलकुल खाली थे और कुर्सी पर पूरे 15 मिनट यूं
ही बैठे रहे, लेकिन तब भी तुम्हें मेरा ध्यान
नहीं आया। दोपहर के खाने के वक्त जब तुम इधर-
उधर देख रहे थे, तो भी मुझे लगा कि खाना खाने से
पहले तुम एक पल के लिये मेरे बारे में सोचोंगे, लेकिन
ऐसा नहीं हुआ।
दिन का अब भी काफी समय बचा था।
मुझे
लगा कि शायद इस बचे समय में हमारी बात
हो जायेगी, लेकिन घर पहुँचने के बाद तुम
रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हो गये।
जब वे काम निबट गये तो तुमनें टीवी खोल
लिया और घंटो टीवी देखते रहे। देर रात थककर
तुम बिस्तर पर आ लेटे।
तुमनें अपनी पत्नी,
बच्चों को शुभरात्रि कहा और चुपचाप चादर ओढ़कर
सो गये।
मेरा बड़ा मन था कि मैं
भी तुम्हारी दिनचर्या का हिस्सा बनूं...
तुम्हारे
साथ कुछ वक्त बिताऊँ...
तुम्हारी कुछ सुनूं...
तुम्हे कुछ
सुनाऊँ।
कुछ मार्गदर्शन करूँ तुम्हारा, ताकि तुम्हें
समझ आए कि तुम किसलिए इस धरती पर आए हो और
किन कामों में उलझ गए हो, लेकिन तुम्हें समय
ही नहीं मिला और मैं मन मार कर ही रह गया।
मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ।
हर रोज़ मैं इस बात
का इंतज़ार करता हूँ कि तुम मेरा ध्यान करोगे और
अपनी छोटी छोटी खुशियों के लिए मेरा धन्यवाद
करोगे। पर तुम तो तभी आते हो जब तुम्हें कुछ चाहिए
होता है। तुम जल्दी में आते हो और अपनी माँगें मेरे
आगे रख के चले जाते हो।और मजे की बात तो ये है
कि इस प्रक्रिया में तुम मेरी तरफ देखते
भी नहीं। ध्यान तुम्हारा उस समय भी लोगों की तरफ
ही लगा रहता है,और मैं इंतज़ार करता ही रह
जाता हूँ।
खैर कोई बात नहीं...हो सकता है कल तुम्हें
मेरी याद आ जाये!!!
ऐसा मुझे विश्वास है और तुम्हारी मुझ पर हो या न हो, मुझे तुम
पर आस्था है।
आखिरकार मेरा दूसरा नाम...
आस्था और विश्वास ही तो है।
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तुम्हारा अपना आप ही
आत्मा@ परमात्मा@ ईश्वर...

रमता जोगी, बहता पानी

हम बचपन से सुनते आये हैं की -" रमता जोगी, बहता पानी " अर्थात यदि योगी,महात्मा ,संत ,साधू ,स्वामी,बाबा ,गुरु ,भगवान् जो भी कहें एक जगह स्थिर होकर और पानी, यानी की जल बहते हुए ही शुद्ध और सिद्ध हो सकता है / किन्तु आज देखने में यह आ रहा है की संत-समाज घूम-घूम कर कथा प्रवचन,शिविर,गुरु-मंत्र वितरण,कृपा-वितरण,समागम आदि करता देखा जाता है / कदाचित इसी प्रवृत्ति पर रोक लगाने हेतु ही चातुर्मास का प्रावधान किया गया, जिसमें की संत कम से कम ४ माह ही सही एक जगह स्थिर रहकर चंचलता से मुक्त हो आत्मावलोकन कर सके और जिस समाज से उसका पोषण,पालन,महिमामंडन हो रहा है, उसके कल्याण के उपाय निकाल कर उरिन होने का उपाय ढूंढ सके / हमारे सभी प्राचीन ग्रिन्थ,उपनिषद भी यही बतलाते हैं की लोग जिज्ञासा-वश ज्ञान,साधना या इश्वर,मोक्ष की प्राप्ति हेतु गुरु के पास समिधा लेकर उपस्थित हुआ करते थे, किन्तु अब तो गुरु ही अपनी मंडली लेकर आ धमकते हैं या शिष्यों को शिविर आयोजन के आदेश देते हैं, प्रचार कराते हैं, विज्ञापन देंते हैं , लाखों-लाखों खर्च करके, मीडिया का प्रयोग करते हैं, आदि-आदि /
आज तो ये विरागी पुरुष व साधिवियाँ विवाह और जन्म समारोहों में भी भागे-भागे जाते हैं और नाच-गाने देखने में मग्न देखे जाते हैं /
क्या यह विचार की बात नहीं की जिस समाज के धन से इनका भरण-पोषण होता है उस समाज के हित के लिए ये शोध व साधन उपलब्ध कराएं, शिक्षा पद्धति में सुधार के लिए आश्रम व्यवस्था की तरह ही अपने मार्ग-दर्शन में प्रकृति की गोद में प्रारंभ कराएं जैसा की कृष्ण मूर्ती फौन्डेशन से जुड़े लोग करने का प्रयास कर रहे हैं / अगर हमारे बच्चे प्रारंभ से ही संस्कारित होकर निकालें तो ये ्यापार,व्यवसाय,जीविका निर्वाह के साथ ही साथ यथा समय इश्वर प्राप्ति व मोक्ष की प्राप्ति भी रूचि व लक्ष्य के अनुसार कर लेंगे / पर ये तो जादातर बूढ़े तोतों को उपदेश देकर उनका कल्याण कम मनोरंजन ज्यादा करते दिखते हैं / अन्यथा क्या कारण है की इतनी बड़ी संख्या में मौजूं विरागी.इश्वर की क्षमता से परिपूर्ण और याहन तक की कई तो भगवान् से भी अपने को बड़ा कहते हुए संतों के पृथ्वी में मौजूद रहते समाज में अनीति,भ्रष्टाचार और पाप व्याप्त है / आचार्य श्री राम शर्मा जी कहा करते थे की " भारत में जितने गावं है उनसे दुगनी संख्या में साधू-महात्मा हैं / अतः यदि दो साधू मिलकर एक गावं को गोद लेलें और उस गावं में शिक्षा-संस्कार,बुराईयों के उन्मूलन के देह-त्याग तक का संकल्प लें तो यह देश पुनः विश्व-गुरु की पदवी प्राप्त करले / पर जो स्वयम ही इन गुणों से रहित हो सिर्फ जीवन-यापन या समाज को धुखा देने लिए, अपनी तुच्छ इच्चाओंन की पूर्ती के लिए वेश धारण किया हो तो महंगी गारियाँ,रूप-विन्याश,महल और भोग-विलास ही जिनका याद रहे जिनका लक्ष्य हो उनसे क्या उम्मीद ? " एक कविता के कुछ अंश याद आ रहे हैं - " जीवन के देवता का अपमान हो रहा है, भगवान् का अमर सुत इंसान रो रहा है / पूजा बहुत हुयी रे, भगवान् के पुजारी // नित भीख माँगते ही, तू जिन्दगी गुजारी / सुख याचना में कैसा, दुःख गान हो रहा है // भगवान् का अमत सुत

Friday, 23 May 2014

SCHOOL DRESS & SCHOOL ACCESSORIES BY Sri school dress




Sri school dress
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मैं ना तो लेखक का लेख हूँ, ना कवि की कविता

मैं ना तो लेखक का लेख हूँ, ना कवि की कविता, ना दार्शनिक का दर्शन, वेश्या का नृत्य, कमजोर व्यक्ति का प्रयास या किसी बच्चे की अनर्गल हरकत, जो किसी तारीफ या इनाम या पसंद या ध्याकर्षन और उसको बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील हो| मैं तो सभी को जीतने या यूँ कहा जाए सभी को जिताने वाला एक पूर्व निर्धारित तथा लोगों की ज़रूरत की पूर्ति और समस्या के निदान के अनुसार सदैव नया रहने वाली व्यवस्था हूँ जो अपने विहित दायित्वों को पूरा करने मे हर तरह से समर्थ भी हूँ| मुझे समझकर या मेरे उपयोग से कोई भी कमजोर व्यक्ति कुछ भी असंभव से असंभव कार्य कर सकता है| फिलहाल इसे वैचारिक, सैद्धांतिक, व्यवहारिक, रूप से लिख कर सिद्ध करने के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से उपस्थित भी हूँ| लोगों की ज़रूरतों की पूर्ति या समस्याओ के निदान हेतु कुछ करना चाहता था उसके लिए बनाए गये एक कार्यक्रम के विचारों की व्यवस्थित और लिखित अभिव्यक्ति हिंदुत्व के दर्शन से मेल खाते थे सो उसके लिए अलग से शब्दो को बनाने के बजाए उन्ही शब्दों का उपयोग कर लिया है| मेरे द्वारा लिखे गये लेख भविष्य मे किए जाने वाले किसी विशिष्ट कार्य के हिस्से है, कोई पंडित, गयानी, गुरु मिला नही इसलिए अपनी कमियों को ढूँढने के लिए सार्वजनिक कर दिया तो समझ मे आया की विरोधी ही सबसे अच्छे गुरु भी होते हैं| इसलिए केवल विरोधियों की कृपा के लिए ही सादर समर्पित|