Saturday, 24 May 2014

रमता जोगी, बहता पानी

हम बचपन से सुनते आये हैं की -" रमता जोगी, बहता पानी " अर्थात यदि योगी,महात्मा ,संत ,साधू ,स्वामी,बाबा ,गुरु ,भगवान् जो भी कहें एक जगह स्थिर होकर और पानी, यानी की जल बहते हुए ही शुद्ध और सिद्ध हो सकता है / किन्तु आज देखने में यह आ रहा है की संत-समाज घूम-घूम कर कथा प्रवचन,शिविर,गुरु-मंत्र वितरण,कृपा-वितरण,समागम आदि करता देखा जाता है / कदाचित इसी प्रवृत्ति पर रोक लगाने हेतु ही चातुर्मास का प्रावधान किया गया, जिसमें की संत कम से कम ४ माह ही सही एक जगह स्थिर रहकर चंचलता से मुक्त हो आत्मावलोकन कर सके और जिस समाज से उसका पोषण,पालन,महिमामंडन हो रहा है, उसके कल्याण के उपाय निकाल कर उरिन होने का उपाय ढूंढ सके / हमारे सभी प्राचीन ग्रिन्थ,उपनिषद भी यही बतलाते हैं की लोग जिज्ञासा-वश ज्ञान,साधना या इश्वर,मोक्ष की प्राप्ति हेतु गुरु के पास समिधा लेकर उपस्थित हुआ करते थे, किन्तु अब तो गुरु ही अपनी मंडली लेकर आ धमकते हैं या शिष्यों को शिविर आयोजन के आदेश देते हैं, प्रचार कराते हैं, विज्ञापन देंते हैं , लाखों-लाखों खर्च करके, मीडिया का प्रयोग करते हैं, आदि-आदि /
आज तो ये विरागी पुरुष व साधिवियाँ विवाह और जन्म समारोहों में भी भागे-भागे जाते हैं और नाच-गाने देखने में मग्न देखे जाते हैं /
क्या यह विचार की बात नहीं की जिस समाज के धन से इनका भरण-पोषण होता है उस समाज के हित के लिए ये शोध व साधन उपलब्ध कराएं, शिक्षा पद्धति में सुधार के लिए आश्रम व्यवस्था की तरह ही अपने मार्ग-दर्शन में प्रकृति की गोद में प्रारंभ कराएं जैसा की कृष्ण मूर्ती फौन्डेशन से जुड़े लोग करने का प्रयास कर रहे हैं / अगर हमारे बच्चे प्रारंभ से ही संस्कारित होकर निकालें तो ये ्यापार,व्यवसाय,जीविका निर्वाह के साथ ही साथ यथा समय इश्वर प्राप्ति व मोक्ष की प्राप्ति भी रूचि व लक्ष्य के अनुसार कर लेंगे / पर ये तो जादातर बूढ़े तोतों को उपदेश देकर उनका कल्याण कम मनोरंजन ज्यादा करते दिखते हैं / अन्यथा क्या कारण है की इतनी बड़ी संख्या में मौजूं विरागी.इश्वर की क्षमता से परिपूर्ण और याहन तक की कई तो भगवान् से भी अपने को बड़ा कहते हुए संतों के पृथ्वी में मौजूद रहते समाज में अनीति,भ्रष्टाचार और पाप व्याप्त है / आचार्य श्री राम शर्मा जी कहा करते थे की " भारत में जितने गावं है उनसे दुगनी संख्या में साधू-महात्मा हैं / अतः यदि दो साधू मिलकर एक गावं को गोद लेलें और उस गावं में शिक्षा-संस्कार,बुराईयों के उन्मूलन के देह-त्याग तक का संकल्प लें तो यह देश पुनः विश्व-गुरु की पदवी प्राप्त करले / पर जो स्वयम ही इन गुणों से रहित हो सिर्फ जीवन-यापन या समाज को धुखा देने लिए, अपनी तुच्छ इच्चाओंन की पूर्ती के लिए वेश धारण किया हो तो महंगी गारियाँ,रूप-विन्याश,महल और भोग-विलास ही जिनका याद रहे जिनका लक्ष्य हो उनसे क्या उम्मीद ? " एक कविता के कुछ अंश याद आ रहे हैं - " जीवन के देवता का अपमान हो रहा है, भगवान् का अमर सुत इंसान रो रहा है / पूजा बहुत हुयी रे, भगवान् के पुजारी // नित भीख माँगते ही, तू जिन्दगी गुजारी / सुख याचना में कैसा, दुःख गान हो रहा है // भगवान् का अमत सुत

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